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History of MAU District

  • मऊ का इतिहास
  • भौगोलिक दृश्टिकोण से मऊ
  • मऊ की संस्कृति में समाहित बुनाई कला
  • मऊ का धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थल
  • स्वाधीनता संग्राम और मऊ
  • भौगोलिक दृश्टिकोण से मऊ

    पूर्वी उत्त प्रदेश के प्रमुख औद्योगिक जनपद मऊ की भौगोलिक रूप से भी एक विशिष्ट पहचान है। गंगा-घाघरा दो-आब के समतल उपजाऊ मैदान में इस जनपद की स्थिति 83.17 डिग्री से 84.32 डिग्री पूर्वी देशान्तर और 24.47 से 26.17 डिग्री उत्तरी अक्षांश के मध्य स्थित है। यह उत्तर में घाघरा नदी, पूरब में बलिया, दक्षिण में गाजीपुर तथा पश्चिम में आज़मगढ़ जनपद से सीमांकित है। घाघरा नदी ही प्राकृतिक आधार है जो गोरखपुर और देवरिया जनपदों से मऊ को अलग करती है।

    मऊ जनपद के मध्य गंगा-मैदान की भौगोलिक विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करता है। भौगोलिक विशेषताओं यथा स्थलाकृति एवं मिट्टी, अपवाह तंत्र एवं जल संसाधन, भौगोलिक संरचना, जलवायु जैव जगत आदि की विशेषताओं से परिचित होना आवश्यक है।

    समतल मैदानी क्षेत्र होने के कारण स्थलाकृतियों में विशेष साम्य मिलता है। सिर्फ नदी प्रवाह क्षेत्रों में नदी में आत्मसात होने वाली छोटी-छोटी नलिकाओं से अपरदनात्मक स्थलाकृति में उबड़-खाबड़ धरातलीय स्वरूप उत्पन्न हुआ है। घाघरा और गंगा के अपवाह क्षेत्र में स्थित जनपद में धरातल का सामान्य ढाल दक्षिण-पूरब को है। जनपद के भू-भाग को दो प्राकृतिक विभागों में विभाजित कर सकते हैं, जिनके विभाजन का आधार बलिया व आज़मगढ़ को जोड़ने वाली पक्की सड़क है। सड़क के उत्तरी प्राकृतिक प्रदेश में कछारी तथा खादर मिट्टी और ऊँचे भाग पर बाँगर मिट्टी मिलती है। टौंस तथा उसकी सहायक छोटी सरयू के क्षेत्र में हल्की बलुई मिट्टी तथा जल जमाव वाले क्षेत्र में कछारी और भारी दोमट मिट्टी की सम्पन्नता मिलती है। दक्षिणी प्राकृतिक प्रदेश में नदी धारा का अभाव है, परिणामतः बाँगर क्षेत्र यत्र-तत्र कंकड़ और ऊसर से प्रभावित है। रानीपुर और परदहा दोनों विकास खण्ड जनपद के ऊसर भूमि को समेटे हुए हैं। उर्वरता की दृष्टि से कम महत्व का क्षेत्र बाँगर होता है।

    नदियाँ जल संसाधन के प्रधान स्रोतों में से एक होती हैं। जनपद का प्रवाह तंत्र टौंस और उसकी सहायक छोटी सरयू निर्धारित करती है। जिनका प्रवाह उत्तर-पूरब से दक्षिण-पश्चिम की ओर है। छोटी सरयू घाघरा के लगभग समानान्तर प्रवाहित होकर मऊ से लगभग 05 किलोमीटर पश्चिम टौंस नदी में मिलती है। घाघरा और टौंस दोनों आगे गंगा की धारा में मिलती है। उनका मुहाना पास में होना तथा मैदान में ढाल मंद होने से बरसात के मौसम में नदी पाशर््िवक कटाव करती है, जिससे नदी मार्ग परिवर्तित होता रहता है। टौंस नदी के उत्तर कोपागंज विकास खण्ड में नदी से 02 किलोमीटर उत्तर खदान से बालू निकलना यह प्रमाणित करता है कि नदी कभी वहाँ से प्रवाहित होती थी जो मार्ग परिवर्तन के कारण दक्षिण खिसक आयी है। घोसी तहसील में बड़े-बड़े तालों का होना यह साबित करता है कि वे नदी के मार्ग में रहे हैं। घाघरा नदी की धारा का निरन्तर दाहिने किनारे को काटते रहना स्पष्ट करता है कि आगामी भौगार्भिक कालावधि में नदी और दाहिने किनारे खिसक कर बहेगी। जल संसाधन की दृष्टि से दोहरी घाट पम्प कैनाल व शारदा सहायक का भी विशेष महत्व है। नदी के अलावा घोसी, मोहम्मदाबाद व मधुबन तहसील में स्थित प्रमुख ताल सिंचाई, मत्स्य उत्पादन, पक्षी विहार तथा पर्यटन की दृष्टि से विशेष उपयोगी है। पकड़ी पिउवा ताल 1.70 किलोमीटर लम्बा और 32 किलोमीटर चैड़ा है। फतेहपुर ताल भी इस दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। जनपद की भौगोलिक-संरचना, चतुर्थक कल्प भी निपेक्षित नदी जलोढ की सैण्ड सिल्ट और क्ले चट्टानों वाली है। बाढ़ क्षेत्र में नया और ऊँचे क्षेत्र में पुराना नदी जलोढ़ मिलता हे। जलोढ़ निक्षेप वाली संरचना खनिज संसाधनों की दृष्टि से महत्वपूर्ण होती है। इसीलिये जनपद में खनिज सम्पन्नता नगण्य है। केवल पुराने जलोढ़ क्षेत्र में लाइम स्टोन एवं कांग्लोमेरेट मिलता है। भौगार्भिक जल स्तर की उपयोगिता अवसादी चट्टानों में सुनिश्चित होती है। जनपद का बंजर क्षेत्र इसका नमूना है, जहाँे 15मीटर की गहरायी पर पर्याप्त जल मिलता है, किन्तु नदी घाटियों में नये जलोढ़ के क्षेत्र में जल स्तर अधिक नीचे होता है। जल संसाधन का हमारे जीवन में विशेष महत्व है। सन्तोष का विषय है कि हमारे जनपद में यह प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।

    जनपद में मानसूनी जलवायु मध्य गंगा मैदान की विशेषताओं को धारण करती है। यहाँ ग्रीष्म, वर्षा और शीत की मौसमी विशेषताएँ मिलती है। मध्य मार्च से मध्य जून तक ग्रीष्म ऋतु मध्य जून से सितम्बर तक दक्षिणी-पश्चिमी मानसूनी वर्षा और अक्टूबर से मध्य मार्च तक शीत ऋतु होती है। पिछले 50 वर्षों में वर्षा रिकार्ड का औसत घोसी में 1001.4मी0मी0 तथा मोहम्मदाबाद में 1004.4 मी0मी0 वार्षिक है। दक्षिणी-पश्चिमी हवाओं से क्षेत्र में होने वाली वर्षा किसानों को खुशहाल बनाती है। पूरे सूर्य वर्ष में वर्षा का विवरण 27 नक्षत्रों में आँकलित किया जाता है। जून से अक्टूबर के नक्षत्र को महानक्षत्र कहते हैं। छठाँ नक्षत्र आद्रा और तेरहवां हस्त(हथिया) वर्षा के लिए विशिष्ठ तथा कृषि के लिए अत्यधिक लाभकारी है। इस सम्बन्ध में एक कहावत हैः-

    चढ़त बरसे आद्र्रा, उतरत बरसे हस्थ,
    कितनो राजा दाण्डी ले, सुखी रहे गृहस्थ।।

    आद्र्रा एवं हस्थ के मध्य क्रमशः पुनर्वस, पुख, असरेखा मघा, पूर्वा, उत्तरा और चित्रा वर्षा प्रदान करने में सक्षम होते हैं।

    तापमान की दृष्टि से मई माह अधिकतम 41.4 सेन्टीग्रेट और न्यूनतम 26.1 सेन्टीग्रेट रहता है। यह सर्वाधिक गर्मी का महीना है। वर्षा का दिन भी ग्रीष्म काल ही अंग है, लेकिन दिन, रात की अपेक्षा कम गर्म होता है। अक्टूबर माह से रात ठण्डी और दिन गर्म होता है। नवम्बर माह से शीत ऋतु आरम्भ होती है। जाड़े में औसत अधिकतम तापमान 23.3 अंश सेन्टीग्रेट और न्यूनतम 9.7 अंश सेन्टीग्रेट ताप होता है। शीत ऋतु में पश्चिम से आने वाले चक्रवातों से बर्फीली ठण्डी हवायें ताप को शून्य अंश सेन्टीग्रेट तक पहुँचा देती है। परिणामस्वरूप कुहरा-कुहासा की प्राकृतिक विशिष्टता नजर आने लगती है। आपेक्षिक आर्दता जुलाई-अगस्त माह में 80 से 85 प्रतिशत तक तथा शुष्क महीनों में 40.5 प्रतिशत तक होती है।

    वनस्पति की दृष्टि से मऊ जनपद को समृद्ध नहीं कहा जा सकता है। कभी का जंगल रहे इस क्षेत्र में वनस्पति का साम्राज्य विनष्ट हो चुका है। बढ़ती आबादी, कृषि भूमि के विस्तार की अवश्यकता, प्रकृति के प्रति उदासीनता ने क्षेत्र से वन और वनजीवन को समाप्त कर दिया है। घाघरा के दियारा क्षेत्रों में बड़े वृक्षों का एकदम अभाव है। केवल यत्र-तत्र बबूल और कँटीली झाडि़याँ ही देखने को मिलती है। बंजर क्षेत्र में नीम, आम, महुआ, पीपल, बरगद, शीशम, गूलर, पाकड़, जामुन और इमली के वृक्ष छिटपुट पाये जाते हैं। टौंस के उत्तरी क्षेत्र में ताड़ के पेड़ काफी पाये जाते हैं।

    वन्य जीवों की दृष्टि से भी जनपद में कुछ उल्लेखनीय नहीं है। वन्य जीवों का अभाव वन के अभाव का प्रतिफल है। नदी के तटवर्ती इलाकों में नीलगायों की अधिकता है। बंदर यत्र-तत्र देखे जाते हैं। भेडि़या, सियार, लोमड़ी घाघरा के निचले इलाको में छिपे मिलते हैं। वन्य जीवों की अन्य प्रजातियों के विलुप्त होने के पीछे सांस्कृतिक भू-दृश्य का प्राकृतिक भूदृश्य पर प्रत्यारोपण है। बढ़ती जनसंख्या के लिए आवास व भोजन उपलब्ध कराने के लिए कृषिक्षेत्र का विस्तार तथा अन्य सांस्कृतिक क्रिया कलापों के विस्तर से क्षेत्र में अधिगम्यता बढ़ी है, फलस्वरूप जीव-जन्तुओं के सिर छुपाने की जगहों का अभाव हुआ और उनकी प्रजातियाँ विलुप्त हो गयी। वन एवं वन्य जीवों का अभाव जनपद में पर्यायवरण असंतुलन को और प्रभावित करती है।