पर्यटन

मऊ जनपद में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्व के विभिन्न स्थल हैः-

घोसी-

तहसील मुख्यालय घोसी प्राचीनकाल में राजा नहुष की राजधानी के रूप में विख्यात थी। इस सम्बन्ध में अनेक ऐतिहासिक साक्ष्य आज भी मौजूद हैै। नगर में आज कल जहाँ सिंचाई विभाग का निरीक्षण गृह है, उसे राजा नहुष के कोट के रूप में मान्यता है। राजा नहुष सतयुग में अयोध्या के सूर्यवंशी राजाओं की पीढ़ी में आते हैं। उनकी दानवीरता एवं शूरवीरता विख्यात थी, जिसके कारण उन्हें देवेन्द्र का पद प्राप्त हुआ था।

श्रीमद् देवीभागवत के छठे स्कन्ध के चैथे एवं पाँचवे अध्याय में यह उल्लेख मिलता है कि प्रतापी दैत्यराज वृत्रासुर का वध देवेन्द्र इन्द्र द्वारा छल से किया गया था। इसके कारण उन्हें ब्रह्म हत्या लगी थी। उस समय पुण्य प्रताप के कारण राजा नहुष को इन्द्र पद प्राप्त हुआ। इन्द्र बने राजा नहुष का मन इन्द्राणी शचि पर मोहित हो गया। माया से प्रेरित शची ने राजा नहुष से कहा कि देवराज इन्द्र मेरे पास ऐरावत हाथी एवं अनके प्रकार के विमानों पर सवार होकर आया करते थे आप जब महान ऋषियों के कन्धे पर ढोई जाने वाली पालकी पर आयेंगे तो मैं आपको स्वयंमेव प्राप्त हो जाऊँगी। कामांध नहुष ऋषियों द्वारा ढोई जाने वाली पालकी में बैठकर शची के पास जा रहे थे, शीघ्र पहुँचने की दृष्टि से वे लगातार ऋषियों को उत्प्रेरित करते रहे। कृषकाय ऋषि इस अपमान को बर्दास्त न कर सके और उन्होंने नहुष को सर्प योनि में उत्पन्न होने का श्राप दे दिया। शापग्रस्त नहुष को देवेन्द्र पद छोड़ना पड़ा और अनेक वर्षों तक सर्प योनि में रहना पड़ा।

कहा जाता है कि शापग्रस्त राजा नहुष सर्प के रूप में अपने किले में स्थित एक कुएँ में रहे, उस समय सरयू नदी उस किले के पास से बहती थी जो आज छोटी सरयू के रूप में जानी जाती है। शापग्रस्त नहुष नदी तट तक पानी पीने के लिए आते थे। द्वापर में धर्मराज युधिष्ठिर ने शापग्रस्त नहुष का उद्धार किया। राजा नहुष का किला आज भी कोेट के रूप में विद्यमान है। इतिहासकारों के अनुसार यदि इस क्षेत्र की खुदाई करायी जाये तो कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आयेंगे।

वाराणसी-गोरखपुर राष्ट्रीय राजमार्ग 29 के किनारे स्थित इस ऐतिहासिक नगर में सड़क के किनारे ही एक पोखरा है और वहाँ एक अतिप्राचीन शिव मन्दिर है। पोखरे के विषय में जनश्रुति है कि इसका निर्माण राजा नहुष ने ही कराया था। यह नृपति पुष्कर के रूप में जाना जाता था, जो कालान्तर में नर पोखरे और वर्तमान में नया सरोवर के रूप में जाना जाता है।

यहाँ एक गयासुर नाम का तालाब है। इसका महत्व गया पुण्यक्षेत्र में फाल्गु नदी तटपर स्थित विष्णुपद के बराबर माना जाता है। यहाँ पर श्रद्धालु पितृपक्ष में पिण्ड दान करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि नहुष के शासन काल में गयासुर नामक राक्षस का बध इसी स्थल पर किया गया था।

देवलासः-

जनपद का प्रमुख पौराणिक व ऐतिहासिक स्थल है। देवलास जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है कि महर्षि देवल की तपोभूमि रही है। महर्षि देवल ब्रह्मा के पाँच पुत्रों में सबसे छोटे थे। यहाँ प्रतिवर्ष ललही छठ पर विशाल मेला लगता हैै। बताते हैं कि भगवान राम ने यहाँ सूर्य देवता की उपासना करने के बाद अपने हाथों से सूर्य मन्दिर के निर्माण हेतु आधारशिला रखी थी। इस सूर्य मन्दिर का निर्माण तत्कालीन राजाओं ने कराया। सूर्य की मूर्ति, कलश अथवा अन्य मूर्तियाँ यहाँ खुदाई में प्राप्त हुई हैं। पूरे देश में पाँच स्थानों पर भगवान सूर्य का मन्दिर है। जिसमें से एक यहाँ देवलास धाम में अवस्थित है।

घोसी से मुहम्मदाबाद गोहना जाने वाली सड़क पर नदवासराय से आगे बढ़ने पर यहाँ मन्दिरों की श्रृंखला बरबस ध्यान आकृष्ट करती है। यहाँ प्रायः सभी जातियों के अपने अलग-अलग मन्दिर है किन्तु मन्दिर के द्वार सभी के लिए खुले हैं। पूजापाठ में किसी तरह का भेदभाव नहीं है। सभी मन्दिरों में हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियां प्रतिस्थापित है। किवंदतियों के अनुसार भगवान राम के वनगमन के पहले पड़ाव का साक्षी देवलास ही था। अपनी वन यात्रा का पहला पड़ाव भगवान श्रीराम ने यहीं रखा था। उस समय तमसा नदी देवलास के पास ही बहा करती थी। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में इस बात का जिक्र किया है कि वन जाते समय भगवान श्रीराम ने प्रथम दिवस तमसा तट पर निवास किया था-

बालक वृद्ध बिहाई गृह। लगे लोग सब साथ।। तमसा तीर निवासु किय। प्रथम दिवस रघुनाथ।।

यहाँ स्थित हनुमान मन्दिर के ठीक सामने कलाकृतियों से सज्जित पत्थर का बहुत बड़ा चैखटा है। जिसके बारे में कहा जाता है कि यह विक्रमी संवत् प्रारम्भ करने वाले महाराजा विक्रमादित्य से सम्बन्धित है। जमीन में धंसे इस चैखट को खोदकर निकालने की अनेक कोशिशें हुई किन्तु दैवीय कारणों से आज तक कोई सफल नहीं हो सका। बताते हैं कि चैखट के नीचे प्रचुर मात्रा में हीरे-जवाहरात मौजूद है। यहाँ के अतिप्राचीन कूप की सफाई के लिए कई बार प्रयास हुआ किन्तु आज तक सफलता नहीं मिली। बताते हैं कि कुँए के अन्दर विभिन्न पात्रों में रत्न भरे हुए हैं।

देवलास में स्थित कबीर पंथी साधु बाबा सुधारदास की समाधि साम्प्रदायिक सद्भाव का संदेश देती है। बाबा की समाज सुधार एवं जनसेवक के रूप में विशेष ख्याति रही है। यहाँ जूनियर हाईस्कूल के प्रांगण में स्थापित महाराणा प्रताप की विशाल मूर्ति भी दर्शनीय है। यहाँ का प्राचीन कुँआ जो सदैव सूखा रहता है, आश्चर्यजनक रूप से मेला के दिनों में पानी से भर जाता है। पर्यटन की दृष्टि से असीम सम्भावनाओं वाला क्षेत्र है देवलास।

पाण्डवों से सम्बन्धित खुरहटः-

जनपद मुख्यालय से लगभग 10 किलोमीटर दूर बलिया-आजमगढ़ मार्ग पर तमसा नदी के किनारे स्थित ग्राम खुरहट को पाण्डवों के आश्रय स्थल के रूप में माना जाता है। जनश्रुति के अनुसार आज से लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व महाभारत काल में जब पाण्डव अपने अज्ञातवास की अवधि गुजार रहे थे तब उन्होंने यहाँ विश्राम किया था। जब वे यहाँ से चलने को हुए तो उनकी गायें चलने में असमर्थ थी। उन्हें खुरपका रोग लग गया था। परिणामस्वरूप बाध्य होकर पाण्डवों को यहाँ कुछ दिनों तक रुकना पड़ा। चूँकि सामूहिक रूप से गायों को यहाँ खुरपका रोग हुआ था, इसलिए इस स्थान को खुरपका कहा जाने लगा, जो कालान्तर में खुरहट हो गया। आज भी खुरहट बाजार के उत्तर तरफ ऐतिहासिक पोखरा तथा कुटी अपनी रमणीयता और प्राकृतिक सौन्दर्य को संजोये हुए हैै।

यहाँ तमसा तट पर अवस्थित विशाल वटवृक्ष पाण्डवों के अज्ञातवास का साक्षी बताया जाता है। जनश्रुति के अनुसार गायों को चराते हुए पाण्डव इसी वटवृक्ष के नीचे आराम किया करते थे। इस विशाल वट वृक्ष की सुन्दरता आज भी देखते ही बनती है।

देई माई का मन्दिरः-

खुरहट के ही समीप सिरियापुर में देवी माँ का मन्दिर लोगों के श्रद्धा एवं विश्वास का केन्द्र है। लगभग 2000 वर्ष पूर्व का यह शक्ति केन्द्र हाथी पर सवार सतीमाता की अनुपम प्रतिमा के लिए भी प्रसिद्ध है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि उनकी यहाँ की गयी मनौती अवश्य पूरी होती है। यहाँ प्रत्येक मंगलवार एवं रविवार को दर्शन-पूजन का विशेष आयोजन होता है।

ऐसी मान्यता है कि मन्दिर क्षेत्र में जो एक बार धुआँ देख लेता है तो उसे चढ़ावा देना जरूरी होता है।

वनदेवी का प्रसिद्ध मन्दिरः-

जनपद मुख्यालय से लगभग 12 किलोमीटर दूर दक्षिण पश्चिम दिशा में प्रकृति के मनोरम एवं रमणीय परिवेश में स्थित है जगत जननी सीता माता का मन्दिर वनदेवी। आज यह स्थान श्रद्धालुओं के आकर्षण का केन्द्र बिन्दु है। वनदेवी मन्दिर अपनी प्राकृतिक गरिमा के साथ-साथ पौराणिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों का प्रेरणा स्रोत भी है। जनश्रुतियों एवं भौगोलिक साक्ष्यों के आधार पर यह स्थान महर्षि बाल्मिकी की साधना स्थली के रूप में विख्यात रहा है। महर्षि का आवास इसी स्थान के आस-पास कहीं रहा होगा। कहा जाता है कि माता सीता ने भी अपने अखण्ड पतिव्रत धर्म का पालन करते हुए यहीं पर अपने पुत्रों लव-कुश को जन्म दिया था। यह स्थान साहित्य साधना के आदि पुरुष महर्षि बाल्मिकी एवं सम्पूर्ण भारतीयता का प्रतीक भगवान राम तथा माता सीता से जुड़ा हुआ है।

जनश्रुति के अनुसार नर्वर के रहने वाले सिधनुआ बाबा को स्वप्न दिखाई दिया कि देवी की प्रतिमा जंगल में जमीन के अनदर दबी पड़ी है। देवी ने बाबा को उक्त स्थल की खुदाई कर पूजा पाठ का निर्देश दिया। स्वप्न के अनुसार बाबा ने निर्धारित स्थल पर खुदाई प्रारम्भ की तो उन्हें मूर्ति दिखाई दी। बाबा के फावड़े की चोट से मूर्ति क्षतिग्रस्त भी हो गयी। बाबा जीवन पर्यन्त वहाँ पूजन-अर्चन करते रहे। वृद्धावस्था में उन्होंने उक्त मूर्ति को अपने घर लाकर स्थापित करना चाहा लेकन वे सफल नहीं हुए और वहीं उनका प्राणांत हो गया। बाद में वहाँ मन्दिर बनवाया गया। वनदेवी मन्दिर अनेक साधु-महात्मा एवं साधकों की तपस्थली भी रहा है। इस क्षेत्र में रहे अनेक साधु-महात्माओं में लहरी बाबा की विशेष ख्याति है। यहाँ श्रद्धालुओं को मानसिक एवं शारीरिक व्याधि से छुटकारा मिलता है।

यहाँ के साधकों के तीसरी पीढ़ी में बाबा दशरथ दास का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। ये अपनी अपूर्व एवं आलौकिक सिद्धियों के कारण विशेष चर्चित रहे है। एक बार यहाँ आये दर्शनार्थियों का एक बालक कुएँ में गिर गया और उसकी मृत्यु हो गयी। मृत बालक के शव को लेकर रोते-बिलखते उसके माता-पिता व अन्य लोग बाबा दशरथ के पास पहुँचे। बाबा ने अपने तपोबल से उसे जीवित कर दिया। बाबा ने यहाँ बलि प्रथा बंद करायी तथा धार्मिक एवं सामाजिक सुधार के बड़े महत्वपूर्ण कार्य कराये।

यहाँ श्रद्धालुजन वर्ष पर्यन्त आते रहते हैं लेकिन अश्विन एवं चैत्र नवरात्रि में जन सैलाब उमड़ पड़ता है। चैत्र राम नवमी के अवसर पर यहाँ विशाल मेले का भी आयोजन होता है जो कई दिनों तक चलता रहता है। माँ वनदेवी का पवित्रधाम आजकल सामूहिक विवाह संस्कार केन्द्र के रूप में विशेष ख्याति अर्जित कर रहा है। यहाँ प्रतिवर्ष सैकड़ों युवक-युवतियाँ माँ वनदेवी के आशीर्वाद की छाँव में अपना नवजीवन प्रारम्भ करते है। लगन के दिनों में यहाँ का दृश्य देखने लायक होता है। बाह्य आडम्बर एवं तड़क-भड़क से दूर श्री माँ के चरणों में नवजीवन की शपथ लेने वाले नवयुवकों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।

सामाजिक-वानिकी एवं वन विभाग ने यहाँ मनोरंजन पार्क बनाकर इसे और आकर्षक बना दिया है। यहाँ एक छोटा चिडि़याघर भी है जो बच्चों को सहज ही आकर्षित करता है। पर्यटन की दृष्टि से इसे और विकसित किया जा सकता है।

नागा बाबा की कुटीः-

जनपद के प्राचीन धार्मिक स्थलों में प्रमुख है। जनाद मुख्यालय पर तमसा नदी के उत्तरी किनारे पर स्थित नागा बाबा की कुटी है। कुटी का धार्मिक वातावरण श्रद्धालुओं को सहज आकिर्षत करता है। यहाँ स्थित पोखरा और उसके किनारे-किनारे मन्दिरों की श्रृंखला सहज ही भक्तों को आकर्षित करती है। यहाँ एक मन्दिर में प्रतिष्ठित गणेश जी की मूर्ति लगभग तीन हजार वर्ष पुरानी बतायी जाती है। यहाँ मन्दिर-कुण्ड एवं स्थान को जागृत करने का श्रेय नागा बाबा को जाता है। गणेश जी की मूर्ति एवं नवमी पोखरा जमीन के गर्भ में दबे थे और वहाँ ऊँचा सा टीला था। इस स्थान के आकर्षण से वशीभूत नागा बाबा यहाँ प्रायः आया-जाया करते थे। उस समय तमसा नदी ही उनकी तपस्थली हुआ करती थी। यह घटना 1940 के पूर्व की है। एक रात नागा बाबा को स्वप्न हुआ कि टीले के नीचे बाउली एवं मंदिर है। बाबा ने वहाँ खुदायी करायी। स्वप्न के अनुरूप वहाँ चमत्कारी बाउली व मंदिर का भग्नावशेष एवं गणेश जी की मूर्ति प्राप्त हुई। नागा बाबा ने बाउली का नव निर्माण तथा उसके चारो ओर मंदिरो का निर्माण कराया। बाउली के चारो ओर पक्की सीढि़याँ बनायी गयी। चर्मरोग से ग्रस्त व्यक्ति के लिए इस पोखरे का जल औषधि माना जाता है। इसमें स्नान करने से चर्म रोग ठीक हो जाता है

अपनी तपश्चर्या व साधना से इस स्थान को श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केन्द्र बनाने वाले नागा बाबा की ख्याति सिद्धपुरुष के रूप में थी। 1936 में जेठ की तपती दुपहरी में उन्होंने बालू की रेती में अपनी धुनी रमाई थी, तो 1945 में जमीन के अन्दर एक सप्ताह तक समाधिस्थ रहे। जन कल्याण के लिए उन्होंने कई यज्ञ कराया। एक सौ वर्ष से अधिक उम्र प्राप्त करने वाले नागा बाबा गत् वर्ष परलोक वासी हुए। उनकी स्मृति में कुटी को और भव्य और आकर्षक स्वरूप दिया जा सकता है।

महाराजा पिथौरागढ़ द्वारा निर्मित षिव मन्दिरः-

जनपद मुख्यालय से लगभग 10 किलोमीटर दूर वाराणसी-गोरखपुर राजमार्ग पर कोपागंज नगर के प्रवेश मार्ग पर स्थित है। आशुतोष भगवान शंकर का ऐतिहासिक मंदिर जिसका निर्माण महाराजा पिथौरागढ़ ने कराया था।

बताया जाता है कि महाराजा पिथौरागढ़ को कुष्ठ रोग हो गया था जो तमाम उपचार के बावजूद भी ठीक नहीं हो रहा था। महाराजा अपने अंग रक्षकों के साथ योगी के दर्शनार्थ गोरखपुर जा रहे थे। उनका काफिला उक्त स्थान पर ही रूका जहाँ बड़ा सा मैदान एवं छोटा सा पोखरा था। शौचादि से निवृत्त होने के बाद महाराजा जब स्नान के लिए पोखरे में उतरे तो चमत्कारिक ढंग से उन्हें काफी आराम मिला। अन्तः प्रेरणा व साथियों की सलाह पर महाराज ने अपनी यात्रा कुछ दिनों के लिए स्थगित कर दी और प्रतिदिन उसी पोखरे में स्नान करते रहे तथा अधिकाधिक उसके जल का सेवन किया। पोखरे के जल में स्नान से महाराज को काफी लाभ मिला, उनका कुष्ठ रोग जाता रहा और वे पूरी तरह स्वस्थ्य हो गये।

कुतूहलवश महाराजा ने उस स्थान की खुदाई करायी। खुदाई में वहाँ एक शिवलिंग मिला। महाराज ने इस शिवलिंग की विधिवत पूजा-अर्चना की तथा यहाँ मंदिर का निर्माण कराया। इस मंदिर की बनावट ऐसी है कि यह प्राकृतिक रूप से वातानुकूलित हैं ग्रीष्म ऋतु में यह पूरी तरह शीतल तथा शीतकाल में गर्म रहता है। यहाँ प्रतिदिन श्रद्धालु आते हैं और प्रतिवर्ष शिवरात्रि पर एक विशाल मेला लगता है।

ऐतिहासिक मस्जिदः-

कोपागंज में ही स्थित जामा मस्जिद लगभग 400 वर्ष पुरानी बतायी जाती है। मस्जिद की छः फुट चैड़ी दीवाल एव इसकी निर्माण कला अद्भुत है। इसका निर्माण नवाब खुदा बख्श ने करवाया था।

नगर के उत्तरी छोर पर एक अन्य प्राचीन भवन स्थित है। कदम रसूल नाम से प्रसिद्ध इस इमारत का निर्माण काल सन् 1600 के आस-पास बताया जाता है। शीया मुसलमान इसे पवित्र मानते है तथा जुमेरात वृहस्पतिवार को यहाँ अगरबŸाी आदि जलाकर विशेष प्रार्थना करते हैं।

बेलौली धामः-

बियावान और निर्जनता के घेरे में अपनी आलौकिक छठा से आगंतुकों को आकर्षित करने वाला यह ऐतिहासिक स्थल अपने धार्मिक महत्व के कारण ही ‘‘धाम’’ के रूप में जाना जाता है- ‘‘बेलौली धाम’’। क्षेत्र के लोगों के लिए चार धामों की तरह का ही एक पवित्र धार्मिक स्थल था किन्तु अव्यवस्था के कारण धीरे-धीरे यहाँ सन्नाटा पसरता गया। दोहरीघाट से 7 किलोमीटर आगे मधुबन मार्ग से एक कि0मी0 उत्तर अवस्थित है।

यहाँ भगवान लक्ष्मण का एक प्राचीन मन्दिर है। मंदिर में स्थापित भगवान लक्षमण की आलौकिक एवं भव्य मूर्ति सहज ही लोगों को आकर्षित करती है। एक दशक पूर्व यहाँ दर्शनार्थियों का दिन-रात तांता लगा रहता था। भण्डारे की आग 24 घण्टे जला करती थी लेकिन अब पहले जैसी भीड़ नहीं होती।

किवंदतियों के अनुसार बेलौली धाम पहले घोर-घना जंगल था। रसूलपुर रियासत घुड़साल बनाने के लिए जंगल साफ करा रही थी। उसी समय जमीन के अन्दर यह प्रतिमा मिली थी। खुदाई के दौरान फावड़े से चोट लग जाने के कारण मूर्ति के ललाट से खून निकलने लगा जिसे देखकर लोग आश्चर्य में पड़ गये। दयाल दास नामक एक व्यक्ति ने मूर्ति उठा ली। बाद में वहाँ एक भव्य मंदिर बनाकर वह मूर्ति प्रतिस्थपित की गयी जो आज भी भक्तों के श्रद्धा व विश्वास का केन्द्र बनी हुई है। यहाँ जुलाई से अगस्त तक प्रत्येक वृहस्पतिवार को विशाल मेला लगता है। भगवान लक्ष्मण की मूर्ति का शिल्प अद्भूत है। कुछ लोग इसे भगवान विष्णु की मूर्ति भी बताते है।

बौद्ध बिहार गोंठाः-

ईसा पूर्व जब भारत-भू-भाग पर तथागत गौतम बुद्ध के संदेशों का प्रचार-प्रसार बौद्ध मठों के माध्यम से होने लगा तो उससे यह क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा। इस क्षेत्र में एक प्राचीन व एक आधुनिक बौद्ध केन्द्र प्रकाश में आता है। प्राचीन केन्द्र के रूप में गोंठा की विशेष चर्चा है। यह नगरी वाराणसी-गोरखपुर-कुशीनगर मार्ग पर सारनाथ से लगभग 130 कि0मी0 तथा मऊ जनपद मुख्यालय से 34 कि0मी0 दूरी पर स्थित है। इस गांव को भगवान बुद्ध की उपदेश स्थली होने का गौरव प्राप्त है। यहाँ तथागत ने अपने शिष्यों एवं भिक्षुओं को बौद्ध धर्म का संदेश दिया था। तथागत ने बौद्ध गया बिहार में सिद्धि प्राप्ति के पश्चात् परिभ्रमण की दृष्टि से पश्चिमी तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश के भागोें को प्राथमिकता दी, जिसमें वर्तमान का सारनाथ(स्पन मृगदाय) जहाँ पर मृग झुण्ड में रहते थे और गोंठा(गोसिज सालवनदाय) जिसका अर्थ है ऐसा स्थल जहाँ गायें झुण्ड में रहती हो तथा साल सागौन व पलास के वन हों।

गोंठा के उत्तर में एक भीठा पर प्राचीन मंदिर है, जिसे लोग नंद बाबा के मंदिर के रूप में जानते हैै। आज भी गाय का दूध इस मंदिर में चढ़ाया जाता हे। मंदिर के समीप पीपल का एक विशाल वृक्ष है। मंदिर के अन्दर एक लाट पर बोधिसत्व के रूप में गौतम बुद्ध की मूर्ति स्थित है। अनुमानतः यह मूर्ति लगभग दो हजार साल पुरानी है।

पाली भाषा में ‘‘गोसिंग साल वनदाय’’ स्थल का वर्णन बौद्ध ग्रंथ ‘‘मज्जिम निकाय’’ 32 महागोसिंग सत(1-4) में मिलता है। इस स्थान पर भगवान बुद्ध द्वारा शिष्यों के साथ स्नान कर बिहार करने तथा उपदेश देने का उल्लेख मिलता है। यहाँ तथागत ने आयुष्मान नन्द, आनन्द, रेवत, अनिरूद्ध आदि प्रमुख शिष्यों को उपदेश दिया था। यहाँ बौद्ध भिक्षु चिंतन, मनन व गोष्ठी किया करते थे। गोष्ठी का जिक्र आज भी यहाँ होता है, वह आयुष्मान नंद, गौतम बुद्ध के भाई व सगी मौसी के लड़के थे। राजा सुयोधन की शादी राजा अंजान के पुत्र सपरबद्ध(देवदास महराजगंज) की लड़की महामाया से हुई थी। माहामाया राजन की दूसरी सुपुत्री थी। बड़ी लड़की का नाम प्रजापति था। राजा सुयोधन ने प्रजापति से भी विवाह कर लिया था। महारानी महामाया से सिद्धार्थ तथा महारानी प्रजापति से एक पुत्री रूपनंदा एवं पुत्र नन्द का जन्म हुआ था जो बाद में गौतम बुद्ध के शिष्य बने।

आयुष्मान नंद भगवान बुद्ध के प्रमुख शिष्य हुए। तथागत के चैरासी हजार उपदेश इन्हें पूरी तरह से कंठस्थ थे, जिन्हें वे पद के रूप में सुनाते थे। इन्ही नंद की ख्याति से जुड़ा यह क्षेत्र निश्चित रूप से प्राचीन काल में बौद्ध बिहार के रूप में विकसित रहा होगा क्योंकि उत्तर भारत के सभी प्रमुख बौद्ध केन्द्र बौद्ध गया व कपिल वस्तु के बीच में स्थित है। इस स्थल को एक प्रमुख बौद्ध केन्द्र व पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है। पर्यटकों की सुविधा के लिए प्रदेश सरकार ने यहाँ आकर्षक ‘तथागत मोटल’ का निर्माण किया है, जो पर्यटकों के अनुकूल है।

जनपद के मुहम्मदाबाद गोहना तहसील मुख्यालय पर एक आधुनिक बौद्ध बिहार स्थापित है। इसका उद्घाटन तिब्बती उच्च शिक्षा संस्थान के निदेशक एवं तिब्बत के निर्वासित सरकार के विदेश मंत्री श्री एस0 रिन0 पोछो ने किया था।

दो हरियों के मिलन का स्थल दोहरीघाटः-

सतत् प्रवाहमान् पुण्य सलिला सरयू के पावन तट पर स्थित दोहरीघाट एक अति प्राचीन कस्बा है। मऊ जनपद की उत्तरी सीमा का अंतिम यह उपनगर गोरखपुर जनपद के अंतिम उपनगर बड़हलगंज का स्वागत करता हुआ एक पाँव पर खड़ा प्रतीत होता है, दोनों तटों के ये तपस्वी सरयूजल राशि के चंचल लहरों के साथ एक दो पग बढ़-बढ़ कर एक दूसरे का वन्दन अभिनन्दन करते हैं। दो उपनगरों के आमने-सामने यह सुरम्य स्थिति अन्यत्र दुर्लभ है। इधर रामघाट, ऐतिहासिक मुगलकालीन मस्जिद तो उधर लेढ़ा घाट और उसके धवल मंदिर ईश्वर अल्ला तेरे नाम की समन्वित मधुर धुन सुना-सुना कर सेतु रज्जु से जुटे ये दोनों उपनगर अपने-अपने निवासियों की आती-जाती अटूट पंक्तियों को देख निहाल हो जाते हैं।

हाँ, तो दोहरीघाट का नाम दोहरीघाट क्यों? इसलिए कि यहाँ दो हरियों का मिलन हुआ था। शिव धनुषभंग कर क्रोधातुर भगवान परशुराम और शील, शक्ति सौन्दर्ययुक्त विवाहोपरान्त, पिता दशरथ, पत्नी सीता अनुज और अनुज बधुओं के साथ जनकपुर से लौटते हुए मर्यादा पुरषोत्तम राम का पुराण प्रसिद्ध मिलन यहीं हुआ था तभी से यह दोहरी है, नदी है तो घाटों का ठाट इसलिए इसका पूरा नाम है ‘‘दोहरीघाट’’।

घाट ही घाट, मंदिर ही मंदिर, दरस परस मज्जन अरू पाना

के लिए आइये चले अयोध्या के लघु संस्करण दोहरीघाट के विभिन्न घाटों पर। मुख्य घाट रामघाट से तो आप पूर्वपरिचित हैं, दक्षिण पश्चिम की ओर कदम बढ़ाइए। यह है जानकी घाट, दुर्गा जी की भव्य प्रतिमा से अलंकृत यह दुर्गा घाट है। यहाँ से सीधे दक्षिण खाकी बाबा की तपोभूमि और खाकी घाट हे। यह है प्रसिद्ध गौरी शंकर घाट इसके मंदिर का भग्नावशेष माँ सरयू की क्रुद्ध लहरों ने इसको विद्रूष बनाते हुए इसके अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। किनारे ही किनारे कुद और आगे ब्रह्मलीन प्रसिद्ध और आडम्बरहीन दिगम्बर सन्तनागा की सरयू विलीन उनकी पूजा स्थली नदी की अनन्त जल राशि में रेलवे लाईन के पास वाले बाबा मेला राम के भव्य मंदिर का दर्शन भी करेंगे। भूल से पीछे छूट गया रास्ते में ही लाहौरी माँ का मंदिर है। हनुमान मंदिर के दर्शन का सुअवसर प्राप्त होता हैं, धन्य हैं धाम दोहरीघाट।